श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 17 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव और गुणों के अनुसार वही उसके जीवन की दिशा तय करती है राजसिक बंधन की ओर और तामसिक पतन की ओर। भोजन, यज्ञ, तप और…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

"मोक्ष संन्यास योग" श्रीमद्भगवद्गीता का अंतिम और सबसे व्यापक अध्याय कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ दो। स्वधर्म पालन ही श्रेष्ठ है। भक्ति ही मोक्ष का अंतिम मार्ग है।…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 11 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैंभगवान ही काल और ब्रह्मांड के नियंता हैं। मनुष्य केवल निमित्त मात्र है; वास्तविक कर्ता भगवान…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 10 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

जगत में जो भी अद्भुत, महान और श्रेष्ठ है, वह भगवान की ही शक्ति और विभूति का अंश सभी श्रेष्ठता और अद्भुतता भगवान की विभूति है। भक्ति का सार यही…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 9 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

भक्तियोग की महिमा और परमात्मा के साथ जीव के संबंध को सरल और गहन रूप में राजविद्या और राजगुह्य भक्ति का महत्व सर्वव्यापकता साधारण और असाधारण भक्त समर्पण का फल:…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 8 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

जीवन के अंतिम क्षणों की तैयारी, साधना की निरंतरता और परमात्मा के स्वरूप को समझने का मार्गदर्शन ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म की परिभाषा अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ मृत्यु के समय…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह माया को पार कर भगवान में लीन हो जाता है परमात्मा को जानना और उसकी अनन्य भक्ति करना ही सर्वोच्च साधना है। ज्ञानी…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 6 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

आसन या तपस्या नहीं, बल्कि आत्मसंयम, समभाव और परमात्मा में ध्यान ही सच्चा योग योगी की स्थिति: इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना। सुख-दुःख, मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समभाव रखना। मिट्टी, पत्थर…

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श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 5 की सघन समीक्षा: श्रीमती पद्मा शुक्ला

कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म में योग ही मुक्ति का मार्ग है।  निष्काम भाव से कर्म करना ही श्रेष्ठ कर्म और संन्यास का तुलनात्मक विवेचन निष्काम कर्म का महत्व:…

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